मजदूर दिवस तो निकल गया लेकिन जानिए इस्लाम क्या कहता है मजदूरों के बारे में !

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आइएम रिसर्च डेस्क : ये मई का महीना है और हम इस साल के इस पांचवे महीने की इस पहली तारीख को काफी पीछे छोड़ आयें है | पहली तारीख इसलिए भी अहम है कि ये इस महीने की पहली तारीख और इसलिए भी कि इस तारीख को हम विश्व मजदूर दिवस के रूप में मनाते है | ये विडम्बना ही है कि जिस दिवस को हम 1886 में शिकागो में हुए बम कांड के बाद से मजदूरों को समर्पित करते आयें है उससे उन मजदूरों की स्थिति और जीविका में कोई ख़ास सुधार आज तक नजर ही नही आया है और आये भी कैसे जब हमने उन मजदूरों को सपर्पित किये गये दिवस को ही अपनी जीविका का साधन बना लिया हो |

आज मजदूर दिवस पर हर कोई मजदूरों के हक की बात करता हुआ नजर आएगा लेकिन वही मजदूर जब चल कर उन्ही भाषणदूतों के दर पर जाता है तो ये किसी तानाशाही साम्राज्य के शशक की तरह उसका उपभोग करते हुए कुछ इस तरह से नजर आते है जैसे कि उन्होंने उसे कुछ पैसों के एवज में गुलाम ही बना लिया हो |

मजदूर यानी एक ऐसा तबका जिसे इस्लाम के अलावा हर एक मजहब ने वंक्षित बनाये रखा और कोई खास महत्त्व न दिया और न ही उनके अधिकारों की बात करते हुए उन्हें समानता और न्याय का भोगी बतलाया बल्कि हुआ तो कुछ ऐसा कि बहुत से दूसरे धर्मों के रहनुमाओं ने उन्हें दंड का भागीदार बतलाते हुए समाजिक कलंक साबित कर दिया | आइये देखते है कि इस्लाम ने हमारे इस आज के रस्मी मजदूर दिवस से पूर्व ही मजदूरों को कैसे और किस तरीकों के अधिकारों से सुसज्जित कर दिया |

क्या कहता है इस्लाम

इस्लाम ने जीवन के दूसरे पहलुओं की तरफ श्रम अधिकार के बारे में खुल के बातें की है और उनके कर्तव्यों के साथ उनके अधिकारों पर व्यापक रौशनी डाली है | आपको ये जानकर हैरत होगी इस्लाम ने ही सबसे पहले ये कानून बनाया कि बगैर मजदूरी का निर्धारण किये हुए किसी मजदूर को मजदूरी पर न लगाया जाये | यहाँ पर ये दिलचस्प बात तो ये है कि इस्लाम ने ही सबसे पहले ये हुक्म जारी किया कि मजदूर को तय मजदूरी से कम रकम नही दी जा सकती ये गुनाह और हराम कामों में से है |

इस्लाम मजदूरों के हक और मजदूरी के मामले कितना है उसका अंदाजा सख्त मुहम्मद (स०अ०व०) के इस कथन से लगे जा सकता है कि “मजदूर की मजदूरी पसीना सूखने से पहले ही अदा कर दी जाये ” | हम अगर बुखारी की तरफ चले तो उसमें मजदूरों के हक के बारे में बहुत सी बातें मिलती एक रिवायत के मुताबिक मुहम्मद साहब ने फ़रमाया कि “अल्लाह तआला फरमाता है कि महाप्रलय के दिन मैं 3 व्यक्तियों का दुशमन रहूँगा उनमें से एक वह है जो किसी मजदूर को मजदूरी पर रखे और उसे पूरी मजदूरी न दे” |
इस्लाम ने अप्रत्यक्ष रूप से भी मजदूरों और गरीबों के बारे में बहुत सी बाते कहीं है और कुरान और हदीस के पन्ने इनसे भरे पड़े है जहाँ खुदा गरीबों और यतीमों , बेवाओं का माल हडप जाने वाले साहूकारों और कारोबारियों को कठिन वक्त की चेतावनी दे रहा है | क़ुरआन के मुताबिक़ जो गलत तरीकों से गरीबों का माल खाते है वो असल में अपना पेट नर्क और जहन्नुम की आग से भरते है और उनका ठिकाना वही है |

आज के इस दौर में देखा जाये तो इस्लाम प्रगतिशीलता के शिखर पर मानवता को बहुत पहले पहुंचा चुका था अगर इन को आज भी लोग अपने अंदर आत्मसात कर लें तो उन्हें कभी मजदूर दिवस बनाने की जरूरत न पड़ेगी |

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