इस्लाम ने निजता का अधिकार 1400 साल पहले दे दिया था ।

फराज़ बुख़ारी

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इस्लाम में निजता

मुख़बिर स्पेशल : इंसान का चिंतन वहाँ तक आज भी नहीं पहुंच पाया , न ही पहुंच पायेगा जहां तक इस्लाम चौदह सौ साल पहले पहुँच चुका था | इस्लाम में प्राइवेसी के अधिकार बहुत ज़्यादा अहमियत हासिल रही है ।

आमतौर पर लगभग हर इंसान के अपने कुछ मामलात ऐसे होते हैं जिन्हें वह दुनिया के सामने ज़ाहिर करना नहीं चाहता ! ऐसे में इस्लामी कानून यानी शरीयत उसको ये हक़ और सहूलियत मुहय्या करवाती है कि वोअपने उन मामलात को ख़ुद अपने तक या अपने घर वालों तक ह पोशीदा रख सके ।

शरियत ना तो किसी दूसरे फर्द को ये अख़्तियार देती है कि उसके उन मामलात में दख़लअंदाजी करे और ना ही किसी इस्लामी हुकूमत को ही ये हक़ हासिल है कि वह किसी फर्द के शख़्सी मसले में जबरन अपना कोई फैसला सादिर करे ,इस सिलसिले में क़ुरान की ये तीन आयात बहुत अहम हैं :

“ये कोई ख़ूबी और नेकी नहीं है कि तुम घरों में पीछे से आओ, बल्कि नेकी तो उसी के लिए है जो (अल्लाह का ) डर रखे ! तुम घरों में दरवाज़ों (की तरफ) से आओ और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम्हें कामयाबी हासिल हो !!” [२:१८९]

“ऐ ईमान वालों ! अपने घरों के सिवा दूसरों के घरों में दाख़िल ना हो जब तक कि इजाजत हासिल ना कर लो और उन घरवालों को सलाम ना कर लो, यही तुम्हारे लिए बेहतर है, शायद तुम समझो ! फिर अगर तुम्हें इजाज़त ना मिले तो दाख़िल मत हो, जब तक इजाज़त ना मिल जाए, और अगर तुमसे कहा जाए कि वापस हो जाओ, तो वापस हो जाओ,यही तुम्हारे लिए बेहतर है ,अल्लाह जानता है जो कुछ भी तुम करते हो । ” [२४:२८] या ऐ वो लोगों जो ईमान लाए (मनफ़ी यानि गलत) गुमान करने से बचो । कई गुमान गुनाह होते हैं और (एक दूसरे की) जासूसी करते हुए मत फिरो ! [४९:१२]

इन आयात की बुनियाद पर अल्लाह के नबी (स.) ने प्राइवेसी के अधिकार को फ़क़त घर में घुसने तक ही महदूद नहीं किया बल्कि एक आम हक़ क़रार दिया, जिसकी रू से दूसरे के घर में झांकना, बाहर से ही निगाह डालना या यहाँ तक कि दूसरे के ख़त को बग़ैर पूछे पढ़ना भी प्रतिबंधित क़रार दिया गया ।

अल्लाह के नबी (स.) ने इसी से सम्बंधित एक सवाल पर फ़रमाया कि : “जब निगाह ही दाख़िल हो गयी तो फिर ख़ुद दाख़िल होने की इजाज़त मांगने का क्या मतलब” [अबू दाउद] आप (स.) ने मज़ीद फ़रमाया “जिस ने अपने भाई की इजाज़त के बग़ैर उस के ख़त पर नज़र दौड़ाई वह गोया आग में झांकता है ! [अबू दाउद]

प्राइवेसी के हक़ की अहमियत को समझाने के लिए आप ने यहाँ तक फ़रमा दिया कि “अगर कोई शख़्स तेरे घर में झांके और तू एक कंकरी मार कर इस की आँख फोड़ दे तो तुझपर कुछ गुनाह नहीं ” [बुख़ारी, मुस्लिम, अबू दाउद] ज़बरदस्ती इजाज़त हासिल करने की कोई गुंजाइश बाक़ी ना रहे, इसलिए आप (स.) ने ये तम्बीह भी फ़रमा दी कि अगर तीन बार इजाज़त मांगने पर भी इजाज़त ना मिले तो वापस हो जाओ ![बुख़ारी, अबू-दाउद]

“जासूसी करते मत फिरो” की तशरीह में मौलाना मौदूदी लिखते हैं : “इसका मतलब है कि लोगों के राज़ ना टटोलो, ना ऐब (और कमियां) तलाश करो, दूसरों के हालात और मआ’मलात की टोह लगाते भी ना फिरो ये हरकत चाहे बद-गुमानी की बिना पर की जाए या महज़ अपना इस्ते’जॉब (Curiosity) को दूर करने के लिये, हर हाल में शरियत इसको मना करती है” ।

दौरे-हाज़िर पर नज़र डालें तो ऊपर लिखी सारी बातें महज़ एक मज़ाक़ बन कर रह गयी हैं । कम पढ़ी लिखी अवाम को देखें तो नाते-रिश्तेदारों और पड़ोसियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की टोह में रहना, कमियां ढून्ढ-ढून्ढ कर बयान करना उनका एक दिलचस्प मश्ग़ला है ।यही हरकतें पढ़ी लिखी अवाम भी करती है, फ़क़त इस फ़र्क़ के साथ कि उनका मौज़ू सेलेब्रिटीज़ होते हैं , Stalking को फैशन समझा जाता है |

पहले दूसरे की डायरी या ख़त छुप कर पढ़ लिए जाते थे, अब लैपटॉप या मोबाइल में झाँक लिया जाता है | थोड़ा और ऊपर की बात करें तो एक कंपनी को दिया गया पर्सनल डाटा कब बाक़ी सैकड़ों कंपनियों के साथ शेयर हो जाता है यह पता ही नहीं चलता | मुजरिम को सज़ा तो कम मिलती है, जो कि होना चाहिए, लेकिन न्यूज़ चैनलों पर उसकी और उसके ख़ानदान की प्राइवेसी के परख़चे ज़्यादा उड़ते हैं, जो कि नहीं होना चाहिए ।

बाक़ी हुकूमत की तो क्या ही बात करें, आप ख़ुद ही Edward Snowden की कहानी पढ़ सकते हैं ||
कहने का मतलब ये है कि सुप्रीम (जोकि अल्लाह के सिवा कोई नहीं है) कोर्ट ने बहुत पहले से ही मानव मात्र को प्राइवेसी का अधिकार दिया हुआ है !! बस ज़रुरत उसके इम्प्लीमेंटेशन की है !

पढ़ें – हज करने का दुरुस्त तरीका , संक्षिप्त में

हालाँकि यहाँ पर जो ऊपर हदीसे और क़ुरआन की आयतें बयान की गयी है उनसे कई गुना ज्यादा अहादीसे और आयतें क़ुरआन में मौजूद जिनमें प्राइवेसी के बारे में ख़ास गुफ़्तुगू की गयी है लेकिन आप इस मुख़्तसर और संक्षिप्त जायजे से ही पता लगा सकते है कि दुनिया आज जिस से सम्बंधित मुद्दे कोर्ट में सुलझा रही है इस्लाम उन मुद्दो और उन मामलातों पर सैंकड़ों साल पहले ही फैसला सादिर कर चुका था

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