आज़ादी के 70 सालों में हमने क्या खोया क्या पाया ?

उठो कि ताज़ा बहारों का एहतमाम करें

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आज़ादी

यासिर असद

इतिहास एक दर्पण है जिनमें जातियां अपना अतीत देखकर भविष्य का अनुमान लगाती हैं, उसके लिए सफर का सामान  तैयार करती हैं और उन्हीं पदों पर आने वाले “कल” ​​की आधारशिला रखती हैं। इतिहास की शिक्षा-दीक्षा भी इसी लिए होती है कि नस्ल-ए-नौ (new generation) अपने गुजरे हुए दिनों को सामने रखकर आने वाले चरणों के लिए अपने आप को तैयार करे | इतिहास जवाबदेही का पृष्ठ है, केवल गर्व और दंभ की विषय-वस्तु नहीं और न ही केवलचाहत और हस्त का जरिया , बल्कि यह हौसला देती है। किसी भी राष्ट्र का इतिहास अच्छा भी हो सकती है और बुरा भी, इतिहास अगर अच्छा  हो तो पढ़ने वालों के लिए उत्साहजनक है, और अच्छा न हो तो भी भविष्य को अच्छा बनाने का संकेत देती है। यह भी संभव है कि अलग अलग विचार रखने वालों के हिसाब से इतिहास बेहतर या बदतर हो।

यह विडंबना है कि हमारा इतिहास भी अजीब घृणा का शिकार रहा है, और यह घृणा से खुद नहीं पैदा हुई बल्कि पैदा की गई है, यह उसी “ड़ीवाइन एंड रोल” नीति की देन है जो भारतीय उपमहाद्वीप में शासन के लिए अंग्रेजों ने इख्तियार की । अंग्रेज तो चले गए, लेकिन जो सांप्रदायिकता के बीज उन्होंने यहां बोए थे, अफसोस कि गुजरते दिन के साथ वह सूखने की बजाय तनावर पेड़ की शक्ल अख्तियार कर गए | बात केवल हिंदू-मुस्लिम तनाव नहीं, बल्कि दो मुस्लिम भाइयों के बीच नफरत है, और इसी पर कुछ अर्ज करना मकसूद है।

15 अगस्त आने को है, योग्य पाकिस्तान के लिए वह 14 अगस्त है और हमारे लिए 15, स्वतंत्रता दिवस, ज़ालिम फ़िरंगियों के अत्याचार से मुक्ति का दिन। हमारे लिए यह दिन गम में डूबी हुई खुशी लाता है, खुशी और ग़मी की मिलीजुली स्थिति सी रूबरू कराता है। हमें स्वतंत्रता तो नसीब हुई लेकिन धूल और खून में लिथड़ी हुई, दस लाख मासूमों की जान पर आधारित स्वतंत्रता भवन पर खड़ी हुई। लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस की सुबह हिंदू-मुस्लिम एकता के महान दाई इमाम हिंद अबुल कलाम आजाद अन्य नेताओं के साथ हसरत व अफसोस की छवि बने खड़े थे, चेहरे से निराशा स्पष्ट थी मानो जुबान की से भाषा से कह रहे हों –

येदाग दाग उजाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इंतजार था जिसका , ये वो सहर तो नहीं

(सहर यानि सुबह) 

ये हमारी भावनायें थी , संभव है आप इससे सहमत न हों , क्योंकि आप का नज़रिया एक अलग मुस्लिम शासन था जिसकी स्थापना आप “ला इलाहा इल्लल्लाह” आधारित करना चाह रहे थे। अबवह सपना साकार हो गया, हमारा हिंदू-मुस्लिम एकता का सपना हकीकत में न बदल सका, यूं पाकिस्तान अस्तित्व में आया। स्वतंत्रता के इस अवसर पर जो दुख नुक़सान सहना पड़ा वह एक पक्ष खंड में नहीं आया। दोनों देशों के मुसलमान इस पीड़ा का शिकार हुए। जिन्हें पाकिस्तान जाना था वह चले गए, जिन्हें वतन अज़ीज़ था वतन प्यारा था उन्होंने यहीं रहने को प्राथमिकता दी। यही हमारा इतिहास है। भव्य आठ सौ साला शासन के बाद दोनों जगहों पर मुसलमानों की जो हालत हुई है वह किसी से छिपी नहीं। तथ्य यह है कि न ही पाकिस्तान “इस्लामी” बना और न ही भारत के मुसलमान अपने देश में चैन से रहे जैसी उन्हें उम्मीदें थी । यह हमारा नुक्त-ए-नजर है हमारी सोच है। हमारा मतभेद केवल इस बात में है कि क्या वास्तव में देश विभाजन सही था , या फिर इसमें मुसलमानों का नुकसान ही हुआ? यह मतभेद शायद हमेशा बाकी रहे।

दरअसल अर्ज यह करना था कि हमारी स्वतंत्रता दिवस को फिलहाल हमारा जवाबदेही दिवस होना चाहिए। विभाजन सही था या नहीं, गांधी, आज़ाद , नेहरू और जिन्ना में कौन मुसलमानों का सच्चा हमदर्द था और कौन नहीं? उन सब पर बहुत बहसें हो चुकी । सोशल मीडिया में हिन्दो-पाक के बीच अनगिनत बहसें हो चुकी , क्या अब समय नहीं हुआ चाहता कि इस सिलसिले को थाम दिया जाए, इतिहास के इस वर्क को बंद कर दिया जाए, एक दूसरे को मौत व बर्बादी का जिम्मेदार ठहरा कर जलील करने का सिलसिला रोक दिया जाए।

आयें , अपनी क्षमतायें इस दिशा में लगायें कि इन सत्तर वर्षों में हमने क्या खोया और क्या पाया? जिस देश के निर्माण तरक्की और अत्याचार से निकालने के लिए हमारे पूर्वजों ने अथक कोशिशें कीं, क्या अब उस देश का निर्माण और उसे तरक्की देना हमारा कर्तव्य नहीं बनता ? अबुल कलाम आज़ाद और मोहम्मद अली जिन्ना को दोषी ठहरा कर अब हमें क्या मिलता है? हिन्दुस्तानियों को यह बात याद रखनी चाहिए कि अगर अबुल कलाम आजाद ने विभाजन का विरोध किया था, तो उसके बनने के बाद वास्तविकता से मुंह नहीं चुराया बल्कि उसे खुले दिल से स्वीकार किया और बहुस्न-ए-खूबी उसे 
 परवान चढ़ाने की हिदायत की। अहले पाकिस्तान भी इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि भारत में रहने वाले मुसलमान भी उनके भाई हैं, हिन्दुस्तान में बसने वाले दोहरी मार झेल रहे इन मुसलमानों की तकलीफें और भी पढ़ जाती है  जब वह यह सुनते हैं कि उनके पड़ोसी ही उन्हें मुसलमान तक मानने को तैयार नहीं।

आइए इतिहास के पन्नो को हिसाब केलिए पलटें न कि गुरूर और दंभ के लिए | आइये 14 अगस्त / 15 अगस्त से आगे के पन्नो का जायजा लें  कि 70 सालों यानी 840 महीनों यानी 25 हजार 200 दिनों की इस लंबी अवधि में क्या वास्तव में हम आज़ाद हुए ? अगर हुए तो किससे आज़ाद हुए, और किससे आज़ादी अभी बाकी है।

तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बरदोश
हम आएं सुबहे-बनारस की रोशनी लेकर
हिमालया की हवाओं ताजगी लेकर
फिर उसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है ?
 

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