डॉ उदय प्रताप ने रचा इतिहास, बाराबंकी को मिला नया शिक्षाविद

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स्पेशल रिपोर्ट:  “विजेता वही है जो सपने देखता है और हार नहीं मानता” प्रसिद्ध समाज सुधारक नेल्सन मंडेला के यह शब्द “उदय प्रताप” की जिंदगी को चरितार्थ करते नजर आते हैं। बाराबंकी में जन्मे डॉ उदय प्रताप पिछले कई सालों से सुर्खियों में है। डॉ उदय प्रताप एक महान शिक्षाविद होने के साथ ही बाराबंकी जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी हैं। हाल ही में उनकी दो नई पुस्तकें प्रकाशित हुई है आइए जानते हैं वो इसके बारे में क्या सोचते हैं।

सवाल: आप की दो नई पुस्तकें प्रकाशित हुई है इसके बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे?

जवाब: पुस्तकें सिर्फ संचार का माध्यम नहीं होती बल्कि ये समाज को बदलने का बेहतरीन साधन होती है। जब आप एक शिक्षक के नजरिए से शैक्षिक तानेबाने को देखते हैं तो आपको बहुत सी कमियां नजर आती है, बहुत से ऐसे आयाम नजर आते हैं जहां परिवर्तन की आवश्यकता होती है, और मेरी ये दोनों पुस्तकें ” विज्ञान शिक्षण” एवं “जीव विज्ञान” उसी का नतीजा है। आशा है कि इसके द्वारा छात्र विषय से संबंधित जटिल समस्याओं को आसानी से समझ सकेंगे।

Dr Uday Pratap Singh

सवाल: आप शिक्षा के नए परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं, क्या ये पुस्तकें उसी का हिस्सा हैं?

जवाब: जाहिर है पहले की तुलना में शिक्षा क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं। शिक्षा के व्यवसायीकरण के कारण एक ऐसे समाज का निर्माण हुआ है जो नौकरशाही पर आधारित है। ऐसे में शिक्षा के मूल तत्वों को बनाए रखना आवश्यक हो गया है। मेरा मकसद है कि लोग सिर्फ नौकरशाह ना बने बल्कि वह ज्ञान और शिक्षा की समझ रखने वाले भी हों, और यही समावेशी तत्व आपको इन पुस्तकों में दिखाई देंगे।

सवाल: आज आप इस मुकाम पर हैं जाहिर है कई परेशानियां आयी होंगी

जवाब: परेशानियां, मुश्किलें तकलीफें ये सब हमारे लिए उपहार हैं बगैर इनके आप आगे बढ़ नहीं सकते। जब आप समाज में नवाचार या किसी भी क्षेत्र में नए तत्वों का समावेश करना चाहते हैं या आप नई शिक्षा पद्धति की शुरुआत करते हैं, तो आपको बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, और मेरे लिए भी ये सब इतना आसान नहीं था।

सवाल: आपने लिखने की शुरुआत कब की, कहाँ से प्रेरणा मिली?

जवाब: एक शिक्षक के लिए पूरा समाज प्रेरणा का स्रोत है। लिखने का शौक तो बचपन से ही था और इसकी प्रेरणा मुझे अपने बाबा रघुराज बहादुर सिंह जी से मिली, जिन्हें आप एक तरह से ‘चलती फिरती लाइब्रेरी’ कह सकते हैं। समाज सेवा इमानदारी और सच्चे रास्ते पर चलने की सीख मुझे अपने पिताजी स्वर्गीय श्री वीर विक्रम सिंह जी से हासिल हुई जो सच्चे कर्म योगी और कुशल समाजसेवी थे। मुझे प्रेरित करने में मेरी माता का अविस्मरणीय योगदान रहा।

मैं हमेशा से चीजों को आलोचनात्मक नजरिए से देखता था। कई बार ऐसी पुस्तकें होती थीं जिनका समझना एक सामान्य छात्र के लिए असंभव था। ऐसे में मुझे महसूस हुआ कि क्यों ना शिक्षा जगत की इस कमी को दूर किया जाए और इस संबंध में मैंने शोध करना शुरू किया और मेरी पहली पुस्तक “प्राम्भिक शिक्षा के नवीन प्रयास” 2018 में प्रकाशित हुई और तब से लेकर अब तक 7 किताबें प्रकाशित हो चुकी है।

पुस्तकों की छाया प्रति

सवाल: शिक्षा जगत में आज आप जाना माना नाम है लेकिन फिर भी कुछ पुस्तकों के नाम बताना चाहेंगे?

जवाब: प्रारंभिक शिक्षा के नवीन प्रयास मेरी पहली पुस्तक थी, फिर इसके बाद बीएलएड पर आधारित ‘अधिगमकर्ता का बोध एवं विकास” प्रकाशित हुई। इन सबके अलावा आगरा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम पर आधारित “समावेशी विद्यालय का सृजन” फैज़ाबाद यूनिवर्सिटी के बीएड पाठ्यक्रम पर आधारित “अधिगम एवं विकास का मनोविज्ञान, एवं “ज्ञान एवं पाठ्यक्रम” को भी काफी लोकप्रियता हासिल हुई।

सवाल: यानी अवध यूनिवर्सिटी फैजाबाद से आपका काफी करीबी रिश्ता है?

जवाब: लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी, एमए, बीएड और एम एड करने के बाद इस संस्थान से ही मैंने पीएचडी की थी। यहां से मिले सम्मान और ज्ञान को ही मैं आगे बढ़ा रहा हूं।

सवाल: वर्तमान में आप इरम डिग्री कॉलेज मेला रायगंज के प्राचार्य पद पर सेवारत हैं। आपके शिक्षण जीवन और अध्यापन की शुरुआत कहां से हुई?

जवाब: इरम डिग्री कॉलेज में प्राचार्य का पद संभालने से पहले मैने भालचंद्र इंस्टीट्यूट लखनऊ अध्यापन कार्य किए और फिर श्री बैजनाथ शिवकला मंगलपुर बाराबंकी में बीएड विभागाध्यक्ष के चीफ प्रॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दी। वर्तमान में इरम डिग्री कॉलेज ही मेलारायगंज मेरी कर्म भूमि है।

सवाल: आपको राधा कृष्णा अवार्ड से सम्मानित किया गया है कुछ कहना चाहेंगे?

जवाब: हर अवॉर्ड और सम्मान आपके संघर्ष का प्रतीक होता है मुझे खुशी है कि समाज ने मेरी कोशिशों को सराहा और मेरी उम्मीदों को पंख मिले। मैं राधा कृष्णा आवार्ड के लिए संबंधित टीम को बधाई देना चाहता हूं। शैक्षिक जगत में किए गए बदलाव और मेरे विचारों को स्वीकार करने के लिए आप सबका शुक्रिया! मैं डॉ छत्रसाल सिंह का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिनके निर्देशन ने मुझे इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया।

सवाल: आप समाजिक मुद्दों पर भी काफी सक्रिय हैं?

जवाब: हर व्यक्ति समाज का हिस्सा है और उसे समाजहित के बारे में जरूर सोचना चाहिए। मेरा एनजीओ ओम सद्गुरु सेवा समिति पिछले कई सालों से समाज कल्याण में हिस्सा ले रहा है। बड़ी खुशी होती है जब आपके द्वारा किसी जरूरतमंद की मदद की जाए।

सवाल: आने वाली पुस्तकों के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

जवाब: फिलहाल मैं एम एड के मनोविज्ञान विषय पर आधारित एक पुस्तक पर कार्य कर रहा हूँ। उम्मीद है आने वाले कुछ महीनों में ये पुस्तक आपके हाथों में होंगी। इस पुस्तक में आपको कुछ ऐसे तथ्य देखने को मिलेंगे और कुछ ऐसी परिभाषाएं होगी जो मनोविज्ञान का परिदृश्य बदल देंगी।

सवाल: कोई संदेश देना चाहेंगे?

जवाब: एक शिक्षक के लिए आवश्यक है कि वह एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां पर बौद्धिकता कि प्रबलता हो। छात्रों को ऐसी शिक्षा दी जाए जिसके माध्यम से ना सिर्फ नैतिकता को बल मिले बल्कि वो ज्ञान-विज्ञान के के प्रचार प्रसार में भी सहायक हो। एक शिक्षक सिर्फ ज्ञान का माध्यम ही नहीं बल्कि किसी भी देश और समाज का भविष्य निर्माता होता है, ऐसे में उनके लिए उन कर्तव्यों का निर्वहन करना अपरिहार्य है जो शिक्षक समाज के लिए तय किए गए हैं।

मुख़बिर न्यूज और यूसी न्यूज़ के संपादक मोहम्मद फैजान से की गई बातचीत पर आधारित

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