पढ़ें एक मुस्लिम क्रन्तिकारी मौलाना सज्जाद की कहानी

ए आर इब्राहिमी

0
मौलाना सज्जाद

मुखबिर विशेष : 1880 में नालंदा ज़िला के पनहस्सा गांव में पैदा हुए मुफ़्ककिर ए इस्लाम हज़रत मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद साहेब का शुमार उन लोगों में होता है जिनका ज़िक्र किये बग़ैर बिहार और हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी की तारीख़ अधुरी है।

मौलाना सज्जाद साहेब की शरुआती तालीम घर पर ही हुई, वालिद मोहतरम मौलवी शेख़ हुसैन बख़्श और बड़े भाई अहमद सज्जाद से फ़ारसी व उर्दू की तालीम हासिल की, इसी बीच वालिद मोहतरम मौलवी शेख़ हुसैन बख़्श का इंताकाल हो गया, अरबी की शुरुआती पढ़ाई मदरसा इसलामिया बिहार शरीफ़ से शुरू की जहाँ उन्होंने अरबी की तालीम मारुफ़ आलिम ए दीन मौलाना वाहिदुल हक़ साहेब के ज़ेर ए निगरानी मुकम्मल की और फिर आला तालीम के लिए कानपुर चले गए, वहाँ मौलाना अहमद हुसैन की निगरानी में रहे फिर वहां देवबंद चले गये |

मौलाना अज़मतउल्लाह मलीहाबादी के हवाले से नसीम अहमद क़ासमी अपनी किताब “बिहार के मुस्लिम मुजाहिदीन ए आज़ादी” में लिखते हैं :- ” देवबंद मे मौलाना सज्जाद साहेब ने शेख़उल हिन्द (र.अ.) से दर्स लिया” कुछ ही वक्त गुज़रा था कि वहाँ मौलाना का झगड़ा हो गया और देवबंद को छोड़ना पड़ा फिर आप कानपुर लौटे और चार साल वहां रहे फिर इलाहाबाद मे मौलाना अब्दुल काफ़ी के मदरसा सुब्हानिया से अपनी डिग्री मुकम्मल की।

फिर मौलाना सज्जाद साहेब ने बिहार शरीफ़ के मदरसा इस्लामिया में पढ़ाने का काम शुरु किया और 1912 में गया शहर चले गये और वहाँ मदरसा अनवार उल उलुम मे पढ़ाने का काम शुरु किया, उसी दौरान उनकी मुलाकात मौलाना ज़ाहिद दरियाबादी से हुई और उनसे उन्होंने अंग्रेज़ी ज़ुबान का इल्म हासिल किया और सियासत के मैदान मे आ गये।

1917 में अंजुमन ए उलमा ए बिहार को काय़म करने में अपनी भरपुर कोशिश की फिर खिलाफ़त आंदोलन, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया … सविनय अवज्ञा आंदोलन मे हिस्सा लेने की वजह से उनके बड़े बेटे को छः माह की क़ैद हो गई |1925 मे जमियत उलमा हिंद की मजलिस मुरादाबाद मे हुई वहाँ उन्होंने अपनी तक़रीर मे साफ़ तौर पर कहा सियासत एैन दीन है | उनका मानना था कि मुसलमानों को कांग्रेस का साथ देना चाहिए और हिंदू मुस्लिम दोनो मिलकर इस देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी हासिल करना चाहिए।

मौलाना ने मुसलमानों के ग़रीब तबके के लिए चम्पारण ज़िला मे मदारिस खोलने का इंतेजाम भी किया और साथ ही साथ शुद्धि संगठन की जमकर मुख़ालफ़त भी की, चम्पारण ज़िले के वाघा नाम के जगह पर उन्होंने एक स्कूल भी खोला और गरीब पिछड़े तबके के लिए लड़ते रहे।

1936 मे बैरिसटर युनुस साहब के साथ मिलकर मुस्लिम इंडिपेंडेट पार्टी की स्थापना की और 1937 मे बिहार मे सरकार का गठन किया | सरकार की राह मे सबसे बड़े रोड़ा बने जय प्रकाश नारायण | कुछ ही महीने बाद यूनुस साहब ने इस्तीफ़ा दे दिया उसके बाद कांग्रेस ने बिहार मे सरकार का गठन किया।

20 फरवरी 1940 को ऩकीब (इमारत शरिया से निकलने वाला अख़बार ) में मौलाना लिखते हैं “अक़ीदे का पब्लिक प्लेस मे ऐलान और इज़हार से इंसानी तहज़ीब को नुकसान पहुंचती है … तमाम फ़िरक़े और और क़ौम के मज़हबी जलसे और जुलूस पब्लिक मुक़ामात पर बंद कर दिये जाने चाहिए … धार्मिक रिती रिवाज और त्योहार का पालन लोग अपने अपने घर मे करें।

मौलाना सजजाद ने गौ हत्या की भी मुख़ालफ़त की थी और उनका ये मानना था कि गौ हत्या के नाम पर जितने दंगे हो रहे हैं इन सब मे जहाँ मुसलमानों का बड़ा नुकसान हो रहा है उसके साथ ही साथ ये हिंदू मुस्लिम इत्तेहाद को भी कमजोर कर रहा है। मौलाना सज्जाद साहेब अपने काम की वजह कर लोगों का दिल व दिमाग़ जीत चुके थे, उनके साथ बड़ी तादाद मे पिछड़े वर्ग के मुसलमान खड़े थे।

मौलान सजजाद साहेब ने खुल कर मुस्लिम लीग की मुख़ालफ़त की था, 1940 के लाहौर अधिवेशन की मुख़ालफ़त की और जिन्नाह को कई खत लिखें, उनके एक खत का उनवान था ‘इस्लामी हुक़ुक़ और मुस्लिम लीग ‘ जिसमे उन्होंने मुस्लिम लीग से कुछ सवाल पूछे थे जिनमे लीग क्यों Complete Independace की माँग नही करती ? मुस्लिम पर्सनल लॉ पर जिन्नाह क्यों ख़ामोश हो जाते हैं ?

पढ़ें – आज़ादी का एक महान नायक मौलाना मुहम्मद अली जौहर

मौलाना सज्जाद साहेब लिखते हैं, लीग के पास बिहार और उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के लिए कुछ नही है … इसलिए कोई तुक नही बनता की पाकिस्तान की माँग का समर्थन किया जाए |

14 अप्रैल 1940 को नकीब मे अपने आर्टिकल जिसका उनवान था ‘ मुस्लिम इंडिया और हिंदू इंडिया के स्कीम पर एक अहम तबसरा’ में लाहौर अधिवेशन की मुख़ालफ़त करते है और मुल्क के बँटवारे की सोच को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं।

पढ़ें – हिन्दुस्तान की आज़ादी में मदरसा शमशुल हुदा पटना का योगदान

मौलाना सज्जाद साहेब जहाँ एक तरफ़ मुस्लिम लीग के लिए रोड़ा बन कर खड़े थे तो दूसरी तरफ़ हिंदू महासभा की भी बखिया उधेड़ रहे थे, मौलाना सज्जाद साहेब की पार्टी का ऑफ़िस फ़्रेज़र रोड में था जहाँ से अक्सर वो पैदल फुलवारी शरीफ़ के लिए निकल जाते थे, मौलाना सज्जाद साहेब को अवाम के पैसे उड़ाने से सख़्त नफ़रत थी, मगर अफ़सोस के हिन्दुस्तान का ये अज़ीम सपुत मुफ़्ककिर ए इस्लाम हज़रत मौलाना अबुल मुहासिन मुहम्मद सज्जाद साहेब 1940 में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गये … जिससे एक तरफ़ लीग को राहत मिली तो दूसरी तरफ़ दंगाइयों को खुली छूट … जो मुल्क में नफ़रत की ज़हर को घोलते गए।

1921 में इमारत शरिया का क़याम हुआ था, मौलाना उसके फ़ाउंडर मेम्बर थे, इमारत से ‘अल इमारात’ नाम का एक अख़बार निकलता था जिसे सविनय अवज्ञा आंदोलन के वक़्त बैन कर दिया गया तब ‘नक़ीब’ नाम से वीक्ली अख़बार निकाला गया जो आज भी जारी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here