पुलवामा हमला: क्या है सच्चाई ?

मोहम्मद फैज़ान

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मुखबिर न्यूज़: देशभक्ति के ओजस्वी नारों और राजनैतिक उन्माद के बीच सवाल पीछे छूटते जा रहे हैं। देश की अस्मिता पर हुए हमले को मजहबी शक्ल देने की तैयारियां जारी है, मामला इतना पेचीदा है कि आप सरकार से सवाल भी नहीं कर सकते और अगर आप ऐसा करते हैं तो मुमकिन है आप देशद्रोही की श्रेणी में शामिल कर दिए जाएं।
सरहदों की निगहबानी करने वाले उन नौजवानों की कुर्बानियों पर शोर मचाने से बेहतर हैं कि आप मसनदे-शाही पर बैठे उन जालिमों से सवाल करें जिनकी एक नाकामी ने 40 जवानों का किस्सा तमाम कर दिया। बीजेपी हुकूमत जिस तरह से इस मामले में दखलंदाजी कर रही है उससे आपको नहीं लगता कि आखिर ये हादसा इलेक्शन के वक़्त ही क्यों पेश आया जबकि इंटलीजेंस तो छोड़िये न्यूयॉर्क टाइम्स ने 6 दिन पहले ही इसके बारे में पेशनगोई कर दी थी।
सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं देश के नौजवानों की अस्मिता और अखंडता का भी है। आखिर कोई ये सवाल क्यों नहीं कर रहा है कि हमला करने वाला आदिल अहमद डार जब 2017 से SOG (Special Opration Groups) के कब्जे में था तो आखिर उसने इतना बड़ा हमला कैसे अंजाम दे दिया और उसकी मुल्क के खिलाफ वो तकरीर कैसे मन्ज़रेआम पर आ गई जिस पर आज मीडिया बड़ी बड़ी बहसें कर रहा है।
कश्मीर टाइम्स और दीगर मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आदिल अहमद डार को एसओजी ने 10 सितंबर 2017 को एक स्पेशल ऑपरेशन में कश्मीर के शोपियां इलाके से गिरफ्तार किया था जबकि उसके दो साथी अल्ताफ अहमद और तारिक़ अहमद मौकाए-वारदात पर ही क़त्ल कर दिए गए थे।
आदिल अहमद डार की गिरफ्तारी पर कश्मीर के डीआईजी S. P. Pani ने खुद ये बयान जारी किया था कि इन सभी का ताल्लुक हिजबुल मुजाहिदीन से है। ऐसे में कई सवाल पैदा होते हैं और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब आदिल अहमद डार आतंकवाद के आरोप में सुरक्षा एजेंसियों के कब्जे में था तो वो बाहर कैसे आया और उसे इतनी भारी मात्रा में बारूद का जखीरा कहाँ से बरामद हुआ।
सवाल तो ये भी है कि उसे बाहर लाने में किसने मदद की और अगर उसका ताल्लुक जैशे-मोहम्मद से था तो डीआईजी पाणी ने ये स्टेटमेंट क्यों दिया कि मारे गए और पकड़े गए सभी आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन से ताल्लुक रखते थे। और अगर आदिल जैसा आतंकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के चंगुल से फरार हुआ तो इसके बारे में कोई एडवाइजरी जारी क्यों नहीं कि गयी।
फोरेंसिक एक्सपर्ट की माने तो आतंकवादी हमले में इस्तेमाल किया जाने वाला बारूद भारतीय फैक्ट्री निर्मित है जिसका इस्तेमाल कश्मीर में रास्ता बनाने के दौरान पहाड़ों को तोड़ने में किया जा रहा था ऐसे में क्या ये सवाल नहीं होना चाहिए कि ये एक्सप्लोजिव आतंकवादियों के हाथ कैसे लगा?
इसमें कोई शक नहीं कि आतकंवाद की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान अपना रोल बखूबी निभा रहा है लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे एक गहरी पृष्टभूमि हो जिसमें देश के सत्ताधारियों के भी नाम हों। खैर मैं अब और सवाल नहीं कर सकता लेकिन आप जानते हैं कि शहीदों की लाश पर सियासत करने से किस के इक़्तिदार की चमक बाकी रहने वाली है।
खैर वक़्त के साथ बहुत सी यादें धुंधली हो जाएंगी, देशभक्ति का ये जोश और उससे फैलता ये उन्माद भी ठंडा हो जाएगा बाकी रहेंगी तो उन 40 शहीदों की यादें जो मुल्क की हिफाज़त और सरहदों की निगहबानी में शहीद हो गए।

(मोहम्मद फैज़ान)

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