मस्जिदे अक्सा पर किसका कितना हक – मुखबिर स्पेशल

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मस्जिदे अक्सा

फिलीस्तीन की समस्या इक ज़माने से यहूदियों और मुस्लिम फिलिस्तीनियों के बीच विवाद बना हुआ है.इस आधार पर न जाने कितनी खून की नदियां बह चुकी हैं! न जाने कितने परिवार तबाह हो चुके हैं! और न जाने कितने ईमान फरोश अपने विश्वास का सौदा करके अपमानित हो चुके हैं! इस्राएल का दावा है कि फिलिस्तीन उनका है, जबकि इस आधी सदी के अतिक्रमण के इतिहास से पहले के किसी दौर में भी उन्हें हाकिमाना और फतेहाना हैसियत मेंवहाँ रहना, या बसना नसीब नहीं हुआ। इसके विपरीत मुसलमानों की उससे गहरी प्रतिबद्धता इस्लाम से आरम्भ से ही साबित है |

कुरान पाक की मशहूर सूरह है, सूरे असरा – इस सूरह की शुरुआत ही इस बयान से होती है कि बड़ी अजमतों का मालिक है वह अल्लाह जो अपने प्रिय दास यानी मोहम्मद पैगंबर को रातोंरात मस्जिदे-हराम से मस्जिदे अक्सा ले गया, जिसके आसपास हमारी बरकतों की छाया रहती है, वह उसे ले गया ताकि वहाँ उसे अपनी अज़ीम निशानियों का अवलोकन कराया |

इरशाद-ए-इलाही है: ( سُبْحَانَ الَّذِیْ أَسْرَی بِعَبْدِہِ لَیْْلاً مِّنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَی الْمَسْجِدِ الأَقْصَی الَّذِیْ بَارَکْنَا حَوْلَہُ لِنُرِیَہُ مِنْ آیَاتِنَا إِنَّہُ ہُوَ السَّمِیْعُ البَصِیْرُ) रातोंरात मस्जिदे हराम से अक्सा, यानी बैतुल मुकद्दस आप को ले जाना, दरअसल इस बात की घोषणा थी कि मोहम्मद-ए-अरबी पैगंबर की नबूवत वैश्विक नबूवत है | जिससे मस्जिद अक्सा का वैसा ही संबंध है, जैसा पवित्र मस्जिद-ए-हराम को और जल्द ही पवित्र मस्जिद और अक्सा, दोनों चाबियाँ आपके हाथों में आ जाएँगी ।

मस्जिदे हराम की चाबियाँ तो फतेह मक्का के बाद ही आपके (मुहम्मद स०अ०व०) के हाथों में आ गई, और मस्जिदे अक्सा की चाबियाँ दूसरे खलीफा-ए-राशिद हज़रत उमर फ़ारूक़ की खिलाफत में आपकी मृत्यु के छह साल बाद मुसलमानों के हाथों में आईं | अक्सा की चाबियाँ आपके हाथों में आएं या अपने जानिसारों के हाथों में दोनों एक ही बात थी। सन 71 हिजरी में मुसलमानों ने फिलीस्तीन को फ़तेह किया और अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक ने यरूशलेम की ऐतिहासिक यात्रा करके खुद अपने मुबारक हाथों से वहाँ के ईसाई पादरी से उसकी चाबियाँ हासिल कीं। इस अवसर पर अमीरुल मोमिनीन ने जिस नैतिकता , और विशाल दरियादिली का मुजाहिरा किया उसने वहां के ईसाइयोंका दिल जीत लिया, और उनमें कई लोग उसी समय इस्लाम ले आए।

उस समय मुस्लिम उम्मा का मस्जिद से जो रिश्ता हुआ, वह सदियों तक कायम रहा, और शान से स्थापित रहा कि फिलीस्तीन इस्लामी सभ्यता का उद्गम स्थल बन गया, और वहाँ के दरोदीवार से इस्लामी सभ्यता की किरणें फूटने लगीं। जब 1096 ई में इस्लाम मुस्लिम हुकूमतों के खिलाफ धर्मयुद्ध का सिलसिला शुरू हुआ, तो उसके परिणाम में कुछ अवधि के लिए दूसरे मुस्लिम इलाकों की तरह फ़िलिस्तीन पर भी ईसाइयों का क़ब्ज़ा हो गया, और मुस्लिम उम्मा वहाँ से बेदखल हो गई | मगर यह महरूमी और खस्ता हाली अधिक दिनों बाकी नहीं रही, जल्द ही वह समय आया, कि मिल्लते इस्लामिया के एक गयूर फरजंद सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के गगनचुंबी इरादों और महत्वाकांक्षाओं ने तानाशाही और सलीबी शक्तियों से टक्कर लेकर और इउनके अभिमान और दंभ के चश्में चकनाचूर कर दिए | उसने यकेबाद दीगर उन पर ताबड़तोड़ हमले किए, और अपनी जबरदस्त ईमानी गैरत , और अपार युद्ध कौशल का प्रदर्शन कर जालिमों के परखच्चे उड़ा दिए , अंत में नब्बे (90) वर्ष के क्रूर कब्जे के बाद ईसाईयों की फौजें बहुत बेबसी के साथ पीछे हटने , और फिर वे उस मुक़द्दस जमीन को मुस्लिम उम्मा के हवाले करने पर मजबूर हो गईं!

तब से लेकर खिलाफत उस्मानिया की बरबादी तक यानी लगातार कई सदियों तक फिलिस्तीनी भूमि मुस्लिम उम्मत को अपनी आगोशए मुहब्बत में लिए रही, और निहायत आब-ओ-ताब के साथ इस्लामी सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती रही। फिर पहले विश्व युद्ध के अवसर पर 11 / दिसम्बर 1917 ईसवी की नाकाबिले यकीन सुबह हुई, और अंग्रेज अपने लाउ लशकर के साथ फिलीस्तीन में प्रवेश करके अवैध रूप से इस पर काबिज हो गए। फिर कुछ समय बाद जब उन्हें दूसरे देशों की तरह फ़िलिस्तीन भी भागना पड़ा, तो उन्होंने अपने घटिया मफाद और स्वार्थ के लिए वहाँ इसराइली हुकुमत की स्थापना को जरूरी समझा, इसराइली हुकुमत के लिए उन्होंने फिलीस्तीन का चुनाव किया ,क्यूंकि उनके अपमानित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए फिलीस्तीन से अधिक उपयुक्त कोई और जगह नहीं हो सकती थी |

समय से साथ उन्होंने फिलीस्तीनी मुसलमानों के खिलाफ घिनौने षड्यंत्र के जाल बनने शुरू कर दिए, और बहुत बेरहमी और स्फ्फाकी के साथ वहाँ के उन मुसलमानों को क़त्ल करने लगे जो वहाँ सदियों से बसे हुए थे, उन्हें वहां से भगाने और उनसे फिलीस्तीन को खाली कराने की नापाक अभियान शुरू कर दिया। इन घिनौनी साजिश में संयुक्त राष्ट्र ने हर तरह से उनका साथ दिया, यहाँ तक कि बहुत बेशर्मी से उनका आज भी साथ दे रही है।

यहाँ ये बात व्याख्यायित कर देनी जरूरी है कि किसी जमाने में मुसलमानों ने भी कई देशों को फ़तेह किया था, जिस तरह दूसरी जातियां अपने समयों में देशों को विजित करती रही , लेकिन मुसलमानों की जीत और अन्य राष्ट्रों की जीत में मुख्य अंतर यह रहा है कि अन्य देशों ने हमेशा देशों पर विजय प्राप्त की है तो उन्हें लूटने, उनके खजाने पर कब्जा करने और अपने महल, या अपने कार्यक्षेत्र सत्ता विस्तार करने के लिए, इसके लिए उन्होंने वहां के निवासियों की अंधाधुंध हत्यायें की यहाँ तक उनकी आबादी को बहुत बेरहमी से लूटा , और हर तरह से उनकी शक्ति को तोड़ने, और उनकी संख्या घटाने की कोशिश की। इसके विपरीत मुस्लिम कौम ने जब भी देशों को फ़तेह किया तो, वहाँ के दीन दुखियों को उनके क्रूर राजाओं से निजात दिलाने के लिए जीत है, उन्होंने हमेशा अन्याय से पोषित राजाओं और उनकी सहयोगियों से लड़ाई की , कभी जनता पर हाथ नहीं उठाया।

उन्होंने कभी किसी बूढ़े, किसी कमज़ोर किसी महिला और एक बच्चे पर हाथ नहीं उठाया, न किसी रूप से उन्हें कोई नुकसान पहुंचाया। उन्होंने वहाँ के निवासियों के साथ हमेशा सहानुभूति और इज्जत का मामला किया , कभी उन्हें लूटने और उजाड़ने और वहाँ ला धन अपने देशों में स्थानांतरित करने की कोशिश नहीं की हद तो यह है कि जिन दुश्मन सेनाओं से उन्होंने युद्ध किया , युद्ध समाप्ति, और उन पर जीत जाने के बादा घायल सैनिकों को जान से मार देने के बजाय खुद अपने हाथों से उनकी मरहम पट्टी की है, उनके लिए अनुकूल खाने-पीने का इंतजाम किया है, और हर तरह से उनकी जान बचाने, नैतिकता संवारने, और उन्हें सही रास्ता दिखाने की कोशिश की है! इसलिए विजित देशों की जनता ने उन्हें हमेशा अपने लिए रहमत सम, उन्हें अपने यहां ठहरने के लिए आमंत्रित किया , और जब वहाँ से वह विदा होने लगे हैं, तो उन्हें रोकने की कोशिश की और अगर वह रुकने को तैयार नहीं हुए, तो प्यार और धन्यवाद की गाथा गाते हुए उन्हें गर्म गर्म आसुओं के साथ उन्हें विदा किया (जैसा मुहम्मद बिन कासिम के साथ हुआ था )

मुस्लिम उम्मत की जीत, और अन्य देशों की जीत यह बुनियादी अंतर है, जिसे कभी फरामोश नहीं करना चाहए.एक युद्ध राष्ट्र के लिए दया है, और दूसरा युद्ध अजाब होती है, जिनसे जंगल के दरिन्दे और बिलों में रहने वाले सांप भी पनाह मांगते हैं! फिर कभी यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि प्रथम विश्व युद्ध से पहले इतिहास में यहूदी कौम का फलस्तीन से कोई संबंध नहीं रहा, जबकि मुस्लिम उम्मा का उस से संबंध का इस्लाम के आरम्भ से है, और यह संबंध कुछ महीनों और कुछ वर्षों का नहीं, बल्कि लगातार कई सदियों पर आधारित है | फलस्तीनी मुसलमानों का बस यही संबंध नहीं कि वह उनका सदियों पुराना वतन है, बल्कि मदीना की हिजरत के बाद तकरीबन सत्रह महीने तक बैतुलमुक़द्दस उनका किबला रहा है, जिसकी तरफ़ रुख़ करके वे अपनी पांच वक्त की नमाज़ें अदा करते रहे हैं।
बुखारी और सही मुस्लिम की रिवायत है कि (عن البراء بن عازب قال صلینا مع رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نحو بیت المقدس ستۃ عشر شہرا، أو سبعۃ عشر شہرا، ثم صرفنا نحو الکعبۃ)

मानो इतिहास के एक दौर में मुस्लिम समुदाय के लिए बैतुलमुक़द्दस की वही स्थिति रही है, जो इससे पहले, फिर उसके बाद से लेकर आज तक, बल्कि क़यामत तक के लिए ख़ानेकाबा को प्राप्त रही है, और प्राप्त रहेगी | यहूदी कौम के पास फिलिस्तीन के हक़दार होने का कोई भी तर्क मौजूद नहीं है, सिवाय इसके कि फिलीस्तीन अल्लाह के उन अनगि नबियों का केंद्र रहा है, जिनका नसबी संबंध इस्राएलियों से था। हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से पहले इक ज़माना दराज तक फिलिस्तीन नबूवत और रिसालत का केंद्र रहा है, और इस नबूवत और रिसालत के ताजदारों की बड़ी संख्या इस्राएलियों से संबंध रखती थी।

हज़रत इसहाक, हज़रत याकूब, हज़रत यूसुफ ,हज़रत दाऊद, हज़रत सुलेमान, हज़रत ज़करिया, यूहन्ना, ईसा , और न जाने कितने अम्बिया व रसूल जिनके नाम भी किसी को नहीं पता, इसलिए कि कुरान उनके द्वारा केवल संकेत किए हैं, उनके नाम नहीं लिए हैं, वे सारे नबी या रसूल या उनमें से कई लोग इसी पवित्र धरती पर भेजे गये या इसी धरती की धुल में दफन हुए |

यहूदी कौम उनमें से बहुतों को अपना नबी कहती, उनका वारिस होने का दावा करती है, और के रूप में विरासत इस भूमि का हक़दार होने पर जोर देती है लेकिन सवाल यह है कि अल्लाह और उन पैगम्बरों और रसूलों से यहूदियों का क्या वास्ता? यहूदी तो उनके दूतों में से एक रसूल पर भी विश्वास नहीं रखते , और न उन्हें बर्दाश्त किया , इसके विपरीत वह अपने इतिहास के हर दौर में उनसे लड़ते रहे! जिन को वह मार सके, उनकी हत्या कर दी। जिनकी हत्या नहीं कर सके, उन्हें झुठलाते और उनका विरोध करते रहे | कुरान पाक में यहूदियों का जिक्र करते हुए कहा गया है: (أَفَکُلَّمَا جَاء کُمْ رَسُولٌ بِمَا لاَ تَہْوَی أَنفُسُکُمُ اسْتَکْبَرْتُمْ فَفَرِیْقاً کَذَّبْتُمْ وَفَرِیْقاً تَقْتُلُونَ۔سورہ البقرۃ:87) (तू क्या ऐसा है कि जब जब तुम्हारे पास कोई रसूल आया ऐसी शिक्षाओं को लेकर जो तुम्हारी तबियत के खिलाफ थीं, तो तुमने झुठला दिया, तुमने अभिमान का मुजाहिरा किया और किसी के खून के प्यासे हो गए!)

यहाँ बजाहिर सवाल किया जा सकता है, कि क्या अम्बिया-ए-बनी इस्राएल अर्थात दूतों पर बनी इसराइल (यानि यहूदियों) में कोई भी विश्वास नहीं किया? इसका जवाब यह है कि ऐसा नहीं है, अल्लाह के हर नबी और हर दूत की बनी इस्राएल (यहूदियों) के थोड़े या ज्यादा लोग विश्वास करते रहे, जिनका ज़िक्र कुरान में जगह जगह मौजूद है, लेकिन विश्वास के बाद वे लोग यहूदी या ईसाई नहीं रहते थे। वह अपने आप को मुस्लिम कहते थे, और मुस्लिम ही कहलाना पसंद करते थे। वह अपनी क़ौम को यहूदियत या ईसाईयत की नहीं, बल्कि इस्लाम की दावत देते थे |
इस सम्बन्ध में कुरआन स्पष्ट करता है कि : मूसा ने कहा: ए मेरी कौम ! अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाए हो, तो उससे अच्छी उम्मीद रखो , अगर तुम इस्लाम के शैदाई हो! सूरतुल यूनुस: 84 – यहाँ तक कि जब वो फिरौन डूबने लगा, तो उसने पुकारा: विश्वास लाया इस बात पर कि कोई अल्लाह नहीं सिवाय इसके जिस पर इस्राएल का मानना ​है, और मैं भी मुस्लिम समुदाय में शामिल हूँ !) यूनुस: 90

फिरौन के जादूगरों ने कहा: हम पर तुम्हारा गुस्सा सिर्फ इसलिए है कि हम ईमान लाए हैं अपने रब की आयतों पर, जब वह हमारे पास आई , ऐ हमारे रब! हमारे ऊपर धैर्य उंडेल दे, और हमारे जान जाए इस हाल में कि हम मुस्लिम हों !) अल आराफ़: 126 ) मल्लिक-ए-सबा ने कहा: ऐ मेरे रब! मैं अपने ऊपर जुल्म किया , और (अब) सुलैमान के साये में रहते हुए मैं भी इस्लाम ले आई अल्लाह के लिए, जो सारे इंसानों का पालनहार है।) सुरः अल नमल : 44तो जब ईसा ने देखा कि वो कुफ्र पर उनकी हत्या पर आमादा हैं, तो पुकारा : कौन हैं मेरे मददगार अल्लाह के रास्ते में? ह्वारियों ने कहा: हम अल्लाह के सहायक, हम ईमान ले आए हैं, गवाह रहिए कि हम मुस्लिम हैं। ) आल इमरान 52

याद करो, जबकि मैं ह्वारियों की तरफ वही की , कि इमान ले आओ मुझ पर और मेरे रसूल पर उन्होंने कहा: हम ईमान लाए और गवाह रहिए कि हम सभी मुसलमान हैं। (सूरः मायदा 111) इन आयतों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि इस्राएल में आने वाले नबियों और रसूलों ने कभी भी यहूदयत और ईसाईयत का निमंत्रण नहीं दिया, बगैर अपवाद के वो सभ मुस्लिम थे, और उन सब ने अपनी क़ौम को इस्लाम ही की तरफ बुलाया था| इस तरह जो लोग उन पर ईमान लाये , वे सभी मुस्लिम करार, और जो लोग ईमान नहीं लाए, वह अपनी यहूदीयत या ईसाईयत पर नाज़ां रहे, और अपने आप को यहूदी या ईसाई कहते कहलाते रहे। इस अवसर पर कोई भी होशमंद और अक्लमंद व्यक्ति सरलता तय कर सकता है कि इन नबियों या रसूलों के वारिस यहूदी होंगे, या मुसलमान ?

अल्लाह का इरशाद है: इब्राहीम के सबसे अधिक करीब वे लोग हैं जिन्होंने उसकी पैरवी की , साथ ही उससे सबसे ज्यादा करीब यह नबी है, और जो उस पर विश्वास करते है, और अल्लाह मोमिनों का सरपरस्त है | इमरान: 68) ) यहूदी राष्ट्र न केवल कि उन नबियों और रसूलों की किसी भी रूप से वारिस हो सकती, बल्कि यह उन सभी की दुश्मन है, इसलिए उनमें से किसी का नाम लेने का भी यह अधिकार नहीं है |यह बगैर अपवाद उन सभी पैगम्बरों और नबियों की दुश्मन है, और खुद हज़रत मूसा भी दुश्मन है, जिनका वह नाम लेती, और जिनकी लाई हुई तौरात का वह हवाला देती है। इस क़ौम ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को कितना तंग किया है, और किस किस तरह उन्हें पीड़ा पहुंचाई है, इसका उल्लेख जगह जगह कुरान में मौजूद है, एक जगह इरशाद है: ऐ वह लोगो! जो ईमान वाले हो, आप उन लोगों की तरह न हो जाना, जिन्होंने मूसा को पीड़ा पहुंचाई, तो अल्लाह ने बचा लिया उसे उनकी पीड़ा से वह अल्लाह हाँ बड़े रुतबे वाला था सूरह अहज़ाब: 69)

एक दूसरी जगह खुद हज़रत मूसा ने अपनी क़ौम से इसी बात का शिकवा किया है: . और याद करो उस वक्त को जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: ए मेरी कौम के लोगों ! तुम क्यों मुझे पीड़ा पहुंचाते हो? जबकि तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं अल्लाह के द्वारा तुम्हारी ओर भेजा गया हूँ! सूरह अलसफ: 5) इस क़ौम ने जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की कदर नहीं की, तो वह उनकी लाई हुई तौरात की क्या कद्र करती ? इसलिए उसने पूरी बेशर्मी से इस पर कैंची चलाई, और उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं के सांचे में ढाल लिया! यह एक दर्दनाक तथ्य है कि इस समय यहूदी राष्ट्र के हाथों में जो तौरात है, यह वो तौरात नहीं जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम लाए थे, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जो तौरात लाए थे, वह तौरात इससे बिल्कुल अलग थी! इसमें कई बातें हैं, जो इस में नहीं थीं, और बहुत सी बातें जो इसमें थीं, उसमें नहीं हैं। आवश्यक है कि इन बातों को हम अच्छी तरह समझ लें, इसलिए कि उनके संबंध में कई लोग गलतफहमी का शिकार हैं।

आज हमारे बीच ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो हज़रत मूसा, हज़रत दाऊद और हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को यहूदियों का नबी कहते हैं! हालांकि यह सब नबी हमारे हैं, यहूदियों का उनसे कोई संबंध नहीं। पैगम्बरों और नबियों के संबंध कभी नस्ल के आधार पर नहीं होते, बल्कि विश्वास ईमान के आधार पर होते है जिसका मतलब है जो उनकी लाई हुई शिक्षाओं का पालन, और उनके बताए हुए रास्ते पर अग्रसर होगा, वही उनका उत्तराधिकारी होगा, और जो उनके रास्ते से हटा और उनकी शिक्षाओं से बेज़ार होगा, इसका उनसे कोई संबंध नहीं होगा। आज ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो यहूदी और ईसाई को स्वर्गीय धर्मों में गिनते हैं, हालांकि यहूदी और ईसाई धर्म के रहस्योद्घाटन या उसके खुदा या दूत से दूर तक कोई संबंध नहीं है। अल्लाह के यहाँ आया हुआ धर्म बस एक धर्म है, इस्लाम … जिसे सर्वशक्तिमान इश्वर ने अपनी प्यारी किताब में स्पष्ट कर दिया (इन्न्द्दीना इन्द्ल्लाहिल इस्लाम ) यानी अल्लाह के पास धर्म बस इस्लाम है |

इस्लाम के अलावा जितने भी धर्म हैं , वह मनुष्यों ने स्वयं बनाए हैं, उनके धर्मों को अपनाने वला व्यक्ति कभी भी अपने प्रभु को नहीं पा सकता, न कभी कल्याण का मुंह देख सकता है इस तरह निश्चित रूप यहूदियत और ईसाईयत की बिल्कुल वही स्थिति है, जो दुनिया के दूसरे अन्य मानव निर्मित धर्मों की है | मगर इन सब बातों के बावजूद, क्योंकि इस्लाम सारी इंसानियत के लिए प्रभु का भेजा हुआ धर्म है, और वह सारे इंसानों के मार्गदर्शन और शुभचिंतन के लिए आया है, इसलिए इसमें किसी तरह की तंगी नहीं है, उसका सीना सबसे विशाल है। अगर यहूदी आज भी अपनी इस्लाम दुश्मनी, और मुस्लिम दुश्मनी से बाज आ जाएँ और फिलिस्तीन के माननीय नागरिकों की हैसियत से फिलिस्तीन में रहना चाहें , तो मुस्लिम समुदाय को वह दूसरों से अधिक उदार दिल पाएंगे । परन्तु यदि वह मुस्लिम समुदाय के सम्मान हमिय्त , और गरिमा को चुनौती देते हैं, और अत्याचार बरबरियत से उस पर कब्जा करके उसे यहूदी राज्य बनाना चाहते हैं, तो मुस्लिम समुदाय किसी भी हाल में यह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता | वह अंत दम तक इसके लिए लड़ता रहेगा ।

अगर मुस्लिम उम्मत के सिरों पर थोपे गये कुछ शासकों और राजाओं का खून सफेद हो गया है, तो इससे इस्राएल को धोखा नही खाना चाहिए! इसराइल को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि आज भी मुस्लिम समुदाय की नसों में दौड़ने वाला रक्त बहुत लाल है, और ईमानी हरारत से खौल रहा है , वह इस्लामी मुक़द्देसात की सुरक्षा के लिए हर बाजी खेल सकती है और अपनी कीमती से कीमती चीज भी दांव पर लगा सकती है! वह अपने सिर पर थोपे गये तानाशाशों और इस्लाम दुश्मन हुक्मरानों से भी आजिज आ चुकी है, और अल्लाह की मदद शामिल हाल रही, तो वह समय दूर नहीं जब वह उन सब को अपने पैरों से रौंद कर सारे दुनिया के सामने एक आदर्श नमूना पेश कर देगी |

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